बेहया हो तुम, बेहया है हम
तुम्हें मारा, तुम्हें रुलाया
तुम्हें प्रताड़ा, तुम्हें जलाया
तुम्हें सजाया, तुम्हें फसाया
किस मिट्टी की बनी हो तुम…
तुम्हें क्या क्या नहीं कहा, तुमने क्या क्या नहीं सहा
तुम्हें सजाया, तुम्हें बेचा
तुम्हें धमकाया, तुम्हें छेड़ा
तुम्हें घूरा, तुम्हें डराया
तुम्हें अपनाया, तुम्हें ठुकराया
तुम्हें नंगा किया, तुम्हें घुमाया
क्या क्या किया हमने, क्या क्या नहीं सहा तुमने
किस मिट्टी की बनी हो तुम ??
बेहया हो तुम, बेहया है हम
इतना तो जुल्म खुद कोई नहीं सहता
काही भी फेकों हर जगह है लगता
हाँ………………..
ये सब करते हुए, बेहया है हम
ये सब सहते हुए, बेहया हो तुम
पर अब समझ मे है आया जैसे मंद बयार की ठंडी छुअन,
जैसे सूरज की पहली किरण।
मन को शांति, जीवन को आभा,
तुममें बसी है अद्भुत जीवन। जैसे मंद बयार की ठंडी छुअन,
जैसे सूरज की पहली किरण।
मन को शांति, जीवन को आभा,
तुममें बसी है अद्भुत जीवन। पवित्रता का प्यारा साया हो तुम।
प्रकृति ने है सजाया
वो पवित्र धरा हो तुम……

बहुत ही अच्छा और सोचने पर मजबूर करने वाला लेख है