क्या कभी सोचा है आपने ?
क्यों हर बार स्त्री का परिचय उसके नाम से नहीं, बल्कि किसी और के उपनाम से शुरू होता है?
क्यों उसकी पहचान हमेशा पिता, पति या पुत्र के सहारे ही पूरी मानी जाती है?
क्या सच में स्त्री का अस्तित्व उसकी अपनी पहचान से अलग होकर ही पूर्ण है?
स्त्री की स्थिति, सामाजिक स्वीकार्यता और रूढ़िवादिता इत्यादि को देख कर मेरा मन सदैव विचलित हो उठता है। स्त्री की कहानी आज भी उतनी ही नयी है जितनी कि पहले हुआ करती थी। कहने को वक्त की करवट के साथ स्त्री के जीवन में बहुत कुछ बदला हैं, चाहे उसका रहन-सहन हो, सोच हो, विचार हो या फिर उसकी सीमाओं के दायरे। हालाकी दायरे फैलें ज़रूर हैं, सीमाएं टूटी ज़रूर हैं लेकिन सीमाएं मिटी नहीं हैं।
बिस्तर से दफ्तर तक, हृदय से आसमान तक का सफर तय करने वाली स्त्री, आज भी सोचनें, विचारने और मनाने की वस्तु बनकर रह गयी है?कुछ हद तक स्त्री का सीमाओं मे रहना उचित हैं, परंतु दुख की बात यह है की यह सीमाएं कौन तय करता हैं।स्त्री के जीवन में, स्त्री का हसना- बोलना, उसकी हाँ – ना , उसकी पसंद – नापसंद सभी पुरुष ही तय करता हैं।
इससे स्त्री को तकलीफ होती हैं और उसका दम घुटता हैं। लेकिन उसकी असली पीड़ा, संघर्ष और आँसू उसके भीतर छिपे रहते हैं।
आत्मा तब और खिन्न हो जाती हैं जब पुरुष सब कुछ तय करने के बाद पूछता हैं और कहता हैं। तुम खुश तो हो ना? और कुछ तो नहीं चाहिए तुम्हें? कैसा लगा इन ऐशों आराम की चीज़ों को पाकर? मैं तुम्हें हमेशा खुश देखना चाहता हूँ।
जहां एक ओर स्त्री विमर्श और स्त्री स्थिति पर ढेरो किताबें और लेख लिखे जा चुके है , वही दूसरी ओर महिला दिवस का विज्ञापन अखबारों में अपनी जगह ढूंढने का वर्षभर इंतजार करता रहता है। तब किसी समाज को, देश को खबर लगती है कि स्त्री का भी मन है, उसकी भी इच्छाएं है, उसको भी सम्मानित करना है। आनद और उमंग की प्रतीक स्त्री, जो स्वयं में एक उत्सव है जिसका इस धरा पर होना किसी महोत्सव से कम नहीं, उसे भी अपना वजूद महिला दिवस के रूप मे मानना पड़ता है।
मैं पूछता हूँ कि इसके विपरीत पुरुषो का कोई दिवस नहीं क्यो नहीं बनया गया और ना ही मनाया जाता है। शायद इसलिए क्योकि हर दिन पुरुषो का होता हैं या फिर पुरुषों मे ऐसा कुछ भी नहीं कि उनकी उपस्थिती को मानाया जाय। रामायण एवं गीता जैसे महान ग्रन्थ जिनकी हम पूजा करते व मिसाल देते हैं उनका जन्म भी कही न कही प्रतक्ष या परोक्ष रूप से सीता एवं द्रोपदी नमक स्त्रियॉं से ही संबंध रखता हैं। स्त्री जो सदा से, सदियों और युगो से मुख्य रही हैं उसे पुरुष ने कभी मुख्य होने नहीं दिया था, ना होने देंगे।
भारत कि भूमि पर स्त्री को को भले ही माँ का सर्वोच्च स्थान दे दें पर समाज तो पुरुष प्रधान ही रहेंगा। पुरुषों ने स्त्री को कभी आदर भी दिया हैं या पूजा भी है तो वह हैं स्त्री का माँ का स्वरूप, परंतु सच तो यह है कि स्त्री बेटी, बहन, माँ एवं पत्नी इत्यादि रूपो मे तोड़ कर ही देखी जाती हैं उसकी पहचान ही इन सभी रूपो से ही है उसका खुद का कोई अस्तित्व नहीं है। बिना पुरुष-उपनाम के स्त्री का अपना कोई वजूद ही नहीं माना जाता हैं स्त्री कि पहचान ही उसके उपनाम से जानी जाती हैं। यदि स्त्री केवल अपना नाम बताए तो वह अनायास ही अनेकों सवालो के साथ कटघरे मे आ जाती है लोग उसके चरित्र को संदेह कि निगाह से देखने लगते हैं। यही नहीं बच्चे के स्कूल और कॉलेज के दाखिले में भी उसके पिता के नाम को ही प्राथमिक्ता ही नहीं दी जाती हैं वरन उसका विवरण भी महत्व पूर्ण होता है।
स्त्री सदैव किसी कहानी, लेख, कविता एवं अनुभव का नया किरदार बन कर रह जाती है। स्त्री को स्त्री रूप में देखना एवं समाज में स्वीकारना बहुत ज़रूरी है जिसे आज तक उस रूप मे नहीं देखा गया है। समय आ गया है के हमे अपनी संकीर्ण सोच को बदल डालना चाहिए और स्त्री का स्त्री रूप स्वीकारना चाहिए अन्यथा स्त्री उपनाम कि आग मे कब तक जलेगी यह कोई नहीं जानता?
“जो बातें हम साधारण मानकर टाल देते हैं, वही किसी की ज़िन्दगी की सबसे बड़ी लड़ाई होती हैं।”
“लेख पढ़ने के लिए शुक्रिया, आपकी उपस्थिति और प्रतिक्रिया ही मेरी सबसे बड़ी प्रेरणा है।”


bahut kub mitr ummid hai aap aage bhi likhte rahenge , bahut sarahniy kary hai